गुरुवार, 20 अगस्त 2015

उक्ति - 63



जो भी हम देखते-सुनते हैं उस पर कम से कम अपने अनुसार सोचने की जरूरत तो होनी ही चाहिए। भीड़ के हिसाब से चलना हानिकारक तो होगा ही।

उक्ति - 62

कुछ और बनने से पहले हम एक 'नैसर्गिक मनुष्‍य' बनेंगे, तो बात बनेगी और जिन्‍दगी संबंधों की कड़ुवाहट से बाहर निकल आएगी।

रविवार, 21 जून 2015

उक्ति - 61

आज वैश्विक समस्‍याएं इसलिए हैं कि अधिकांश देशी-विदेशी नेतृत्‍वकर्ता व्‍यसनों की दिनचर्या को बौदि्धक वृदि्ध का एक सरल मार्ग मान बैठे हैं। जबकि गहन जीवन सूत्र कहते हैं कि व्‍यसनों में लिप्‍त व्‍यक्ति केवल आदेश मानने योग्‍य ही हो सकता है, ना कि नीतियां बनाने और आदेश देनेवाला।

मंगलवार, 2 जून 2015

उक्ति - 60


प्रतिशोध और क्रोध के बिना जो भी विचार होगा, वही श्रेष्‍ठ विचार होगा।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

उक्ति - 59

क्‍या आज कोई ऐसा मनुष्‍य है, जिसे याद रहे कि वह मनुष्‍य है? यदि सच में ऐसा कोई मनुष्‍य कहीं है, तो वह इस मशीनी समय में भगवान के समान है।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

उक्ति - 57

ब्रह्मचर्य सिद्ध करने की बात निरर्थक है क्‍योंकि ब्रह्मचारी को तो अबोध शिशु भी पहचान लेता है।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015