गुरुवार, 20 अगस्त 2015

उक्ति - 63



जो भी हम देखते-सुनते हैं उस पर कम से कम अपने अनुसार सोचने की जरूरत तो होनी ही चाहिए। भीड़ के हिसाब से चलना हानिकारक तो होगा ही।

उक्ति - 62

कुछ और बनने से पहले हम एक 'नैसर्गिक मनुष्‍य' बनेंगे, तो बात बनेगी और जिन्‍दगी संबंधों की कड़ुवाहट से बाहर निकल आएगी।